11/1/07

चार कन्धो मे लिये जा रहे थे
आठ आसूँ भी बहा रहे थे
चैन की नींद मिली नही जीते जी
अब चन्दन के सेज सजे जा रहे थे

था मै कितना बुरा अब तक
लोग अच्छा कहे जा रहे थे
खूद के लिये कभी जपे नही
मेरे लिये रामनाम लिये जा रहे थे

ना कोई भेद था, ना कोई फरेब थे
कल जो थे दूर, आज कितने करीब थे
कल थे अलग, आज सब एक थे
कोई काला ना पीला, सब सफेद थे

किस किस ने दी कुर्बानी समय की
किस किस ने तकलीफ सहे थे
आज उसने भी मीटिंग cancel की
जो कल online हो कर भी away थे

मौत का देखो यहां
कितना सुन्दर नजारा था
जो कल हुआ ना अपना,
वो आज हमारा था

मन करता कि मै उठ जाऊ
सब को एक बार गले लगाऊ
पर इन्तजाम काफी अच्छा था
गिरू ना, रस्सी से बान्ध रखा था

अब तक जी कर मर रहा था
अब मर कर जी रहा था
कल अपनी साँसो से बोझिल
आज सबकी धडकनो मे धडक रहा था

पर लोग जब मरे हुये को इतना प्यार करते है
क्यो नही जीते जी उनके गले लगते है
मरने के बाद उनके घर मोह्ल्ले भर का खाना
जीते जी क्यो उनके घर चुल्हे नही जलते है
 

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