11/1/07

फिर से वही मंज़र ...!!!

"पैऱों के ज़ख़्म मंज़िल पे.. पहुँच के ग़िन लेंग़ें,
क़ि रुक -रुक के संभलने की, हमें आदत ज़रा कम है.'

'लगता है ख़ुश्बुओं से.. कोई हादसा हुआ है,
गुलशऩ में तितलियों की.. शरारत ज़रा कम है. '

'फिर से वही मंज़र है.. निगाहों से रू-ब-रू अब,
पिंज़ऱों से परिंदों की.. ज़माऩत ज़रा कम है.'

'बेफ़िक्र सी आवाऱगी.. है अब भी साथ !! लेकिन,
मुझे अब ज़माने से.. शिकायत ज़रा कम है.'

'उनसे हमारी गुफ़्तगू का.. फ़ायदा है क्या अब??
कि हम पे उनकी नज़र-ए-इनायत ज़रा कम है.'

'बचपन है गुमशुदा.. ये किताबों की सरज़मीं है,
बच्चों को मचलने की.. इज़ाज़त ज़रा कम है.'

'झूठी सी ये अफ़वाह भी.. तोड़ेग़ी नशेमन को,
कि लोगों में ना लड़ने की, शराफ़ात ज़रा कम है.'

'अंदाज़ मेरे लिखने का.. अब भी वही है !! पर,
ग़ज़लों में कहकहों की, रवायत ज़रा कम है.'

'दुश्मन की दोस्ती से.. ना कुछ फ़र्क़ अभी 'शायर',
बात ये कि दोस्तों से.. अदावत ज़रा कम है...!!!"
जो दुनिया के इल्ज़ाम आने थे आये,
बहुत गम के मारो ने पहलू बचाये !
न दुनिया ने थामा न तूने सम्भाला,
कहाँ आके मेरे कदम डगमगाये !
किसी ने तुम्हे आज क्या कह दिया है,
नज़र आ रहे हो पराये-पराये !
मुलाकात की कौन सी है यह सूरत,
न हम मुस्कुराये न तुम मुस्कुराये !
उलझते है हर राह् पे अब तो काँटे,
कहाँ तक कोई अपना दामन बचाये !!!
कौन सुलगते आँसू रोके, आग के टुकडे कौन चबाये,
ओ हमको समझाने वाले कोई तुझे क्योंकर समझाये !
जीवन के अँधियारे पथ पर जिसने तेरा साथ दिया था,
देख कही वह कोमल आशा आँसू बन कर टूट न जाये !
इस दुनिया के रहने वाले अपना अपना गम खाते है,
कौन पराया रोग खरीदे कौन पराया दुःख अपनाये !
हाय मेरी मायूस उम्मीदे ! हाय मेरे नाकाम इरादे,
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अन्दाज़ न आये !!!
कहाँ गये वो दोस्त, जो हरदम याद किया करते थे...,
जान - बुझकर न सही, मगर भूले से भी मेल किया करते थे...,
खुशी और गम में हमारा साथ दिया करते थे...,
लगता है सब खो गया है ... प्रोजेक्ट्स की डेड्लाइन्स में...,
न अपनी न हमारी, जाने किसकी यादों में...,
ज़िन्दगी को भुला चुके हैं, नौकरी की आड में...,
हरदम फ़ँसे रहते है, अपने पी.एम. के जाल में...,
कभी आओ मिलो हमसे, बैठकर बाते करो...,
दर्द - ए- दिल अपना कहो, हाले - ए - दिल हमारा सुनो...,
क्या रंजिश, क्या है शिकवा, क्या गिला और क्या खता... ;
हम भी जाने तुम भी जानो, आखिर क्या मंज़र क्या माजरा...,
बस भी करो अब...
कह भी दो, अपने दिल का हाल,
क्या करोगे खामोश रहकर
जो चली गई ये ज़िन्दगी, चला गया ये कारवां...;
जागो प्यारे...! अब बस भी करो,
सिर्फ़ काम नही, थोडा ज़िन्दगी को भी महसूस करो...,
खाओ, पिओ, हँसो, गाओ, झूमों, नाचो, मौज करो...,
हकीकत में ना भले पर कम - से - कम ...
.. भूल से ही सही हमें याद तो करो...
हम तो हरदम देंगे यही दुआ आपको..
याद न भी करो तो क्या, चलो, एन्जॉय ...............................
यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !
तूने जीवन जोत जगायी,
मैने पग पग ठोकर खायी,
जिस रस्ते पर डाले तू मै उस रस्ते पर हो लूँ,
यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !
तूने तो मोती बरसाये,
मैने काले कंकड पाये,
मै झोली मे कंकड लेकर मोती जान के रो लूँ,
यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !
तूने फूल सुहाने बाँटे,
मेरे भाग मे आये काँटे,
मै झोली मे काँटे लेकर फूल समझ के तोलूँ,
यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !
तूने भेजे अमृत प्याले,
पड गये मुझको जान के लाले,
मै विष को भी अमृत जानूँ लेकिन भेद न खोलूँ,
यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !

यह सब तेरी देन है दाता, मै इसमे क्या बोलूँ !
एक तुम्हे पाने की खातिर नीद गँवाई चैन गँवाया,
तुमको अपने दिल मे बसाकर जी को कैसा रोग लगाया !
आँसू के कुछ मोती चुनकर सपनो की मालाएँ गूँथी,
प्रेम की उन मालाओ को भी हँस-हँस कर तुमने ठुकराया !
प्यार भरी मुस्कान तुम्हारी माँग रहा था कब से जोगी,
तुमने इस जोगी को अपने द्वार से खाली हाथ फिराया !
तुमने सजाई थी फुलवारी रंग-बिरंगी फूल थे जिसमे,
उन फूलो का रूप दिखाकर मुझको काँटो मे उलझाया !
आज मेरे जीवन के पथ पर छाया है घनघोर अँधेरा,
मेरा सब कुछ लूटने वाले तुमने मुझे किस राह लगाया !
जाने कब तक जीवन पथ पर यूँ ही भटकता रहना होगा,
इतनी लम्बी राह मे अब तक कोई अपने साथ न आया !!!!
 
वो जो भुलाए बैठे है हमे एक अरसे से,
वो कब तक प्यार से नज़रे चुरायेंगे देखना है !

उलफत है उन्हे भी हमसे, जानते है ये वो भी,
पर कब तक अपने जज़्बात दिल मे छुपायेंगे देखना है !

आयेंगे जब भी हम उन्हे याद वो खुद को न रोक पायेंगे,
पर याद उन्हे हम कब आयेंगे ये देखना है !!!!
प्यार की हार से डरना कैसा, प्यार की हार भी जीत है प्यारे
टूटे दिल की टीसो मे भी, एक सुहाना गीत है प्यारे !!
प्यार के दुखडे कदम कदम पर, एक अछूती राह समझाये,
वर्ना इस अँधियारे जग मे, कौन किसी का मीत है प्यारे !!
उजली सेज़ पै सोने वाले, प्यार की सुन्दरता क्या जाने,
प्रेमी की पलको पर मोती, साँसो मे संगीत है प्यारे !!
अपनी आशाओ की कलियाँ, इस दुनिया से ओझल कर लो,
फूल पै धूल उडा कर हँसना, इस दुनिया की रीत है प्यारे !!
रात के गहरे सन्नाटे मे, शबनम बनकर रोने वाली,
या चन्दा की ढलती छाया, या पँछी की प्रीत है प्यारे !!
 

यारों तुम्हारे नाम...!!!

"खुदा जाने !! हमें वो किस तरह.. नीलाम करते हैं??
हमारी 'शायरी ' को बेवजह.. बदनाम करते हैं.'

'भले ही दिन गुज़र जाए , फ़कत ख़ामोश लमहों में,
हंसी के चंद कतरों से.. हम सुबह-ओ-शाम करते हैं.'

'है क़ायम सिलसिला.. लेने का - देने का ग़रीबों से,
खुशी देकर उन्हें, ग़म उनका.. हम सरनाम करते हैं.'

'ये मेरी शख़्सियत उनकी.. अदावत से निखर आई,
तहे दिल से रकीबों का.. हम एहतऱाम(सम्माऩ) करते हैं.'

'सज़ा जैसे ना कोई बात.. ये फ़ितरत है मिज़ाज़ों की,
डगर काँटों भरी हो जब भी.. हम क़याम करते हैं.'

'बुज़ु्र्गों से विरासत में.. मिली ये खासियत हमको ,
क़ि हम साज़िश को, हऱ पल हऱ कदम.. ऩाकाम करते हैं.'

'दुआयें और मोहब्बत से भरा.. दिल साथ रखा है,
सफ़र के पहले बस इतना.. हम एहतमाम (तैय्याऱी) करते हैं.'

'लगी जाती है मज़लिस ख़ुद ब खुद.. दर पे दीवाऩों की,
हम अपनी ये गज़ल.. यारों तुम्हारे नाम !! करते हैं.'

'अकल को ज़िन्दगी भर हमसे, ये शिकवा रहा 'शायर',
क़ि हम जोश-ओ-ज़ुनूं से ही.. हमेशा काम करते हैं...!!!"
जीवन के कुछ अनकहे सच :--------

सच्चा प्रेम भूत की तरह है - चर्चा उसकी सब करते हैं, देखा किसी ने नहीं।

काम दुनिया में सबसे बड़ी चीज है, इसलिये हमें चाहिये कि हमेशा कल के लिये भी रहने दिया करें।

पत्ते अच्छे हों तो आदमी ईमानदारी से खेलना पसंद करता है।

अगर ईश्वर न भी हो तो उसका आविष्कार कर लेना जरूरी है।

बाबा आदम के जमाने से ही बेवकूफ बहुमत में रहते आये हैं।

तन्दुरुस्ती वह चीज है जिससे आपको यह मालूम होता है कि साल का यही बेहतरीन वक्त है।

कुछ फिल्मी सुन्दरियां मन्दिर में भी धूप का चश्मा पहनकर जाती हैं; उन्हें डर लगा रहता है कि कहीं भगवान उन्हें पहचान कर ऑटोग्राफ न मांग बैठें।

गरीबी अमीरों लिये एक पहेली है; समझ में नहीं आता कि लोगों को खाना चाहिये तो वे घण्टी क्यों नहीं बजा देते।

आर्टस्कूल वह जगह है जहां लड़कियां हाईस्कूल और शादी के बीच का वक्त गुजारती हैं।

अनुभव हमारे ज्ञान को बढ़ा देता है लेकिन हमारी बेवकूफियों को कम नहीं करता।

खुदा बेवकूफों को महफूज रखे, उन्हें खत्म न हो जाने दे; क्योंकि अगर वो न रहे तो समझदारों की रोजी मुश्किल हो जायेगी।

कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं
मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं

कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में
सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं

कई सदियों में आती है कोई सूरत हसीं इतनी
हुस्न पर हर रोज कहां ऐसे श़बाब आते हैं

रौशनी के वास्ते तो उनका नूर ही काफी है
उनके दीदार को आफ़ताब और माहताब आते
मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले
किसी के इतने पास न जा

के दूर जाना खौफ़ बन जाये

एक कदम पीछे देखने पर

सीधा रास्ता भी खाई नज़र आये


किसी को इतना अपना न बना

कि उसे खोने का डर लगा रहे

इसी डर के बीच एक दिन ऐसा न आये

तु पल पल खुद को ही खोने लगे


किसी के इतने सपने न देख

के काली रात भी रन्गीली लगे

आन्ख खुले तो बर्दाश्त न हो

जब सपना टूट टूट कर बिखरने लगे


किसी को इतना प्यार न कर

के बैठे बैठे आन्ख नम हो जाये

उसे गर मिले एक दर्द

इधर जिन्दगी के दो पल कम हो जाये


किसी के बारे मे इतना न सोच

कि सोच का मतलब ही वो बन जाये

भीड के बीच भी

लगे तन्हाई से जकडे गये


किसी को इतना याद न कर

कि जहा देखो वोही नज़र आये

राह देख देख कर कही ऐसा न हो

जिन्दगी पीछे छूट जाये


ऐसा सोच कर अकेले न रहना,

किसी के पास जाने से न डरना

न सोच अकेलेपन मे कोई गम नही,

खुद की परछाई देख बोलोगे "ये हम नही
 
एक बार एक बहु मंजिला इमारत में आग जल गई, सारे लोग बच कर भाग गये पर एक मारवाड़ी सेठ, एक शराबी और बंता सिंह इमारत में सोते रह गये जब बहुत शोर होने लगा तो उनकी नींद जागी पर चुँकि आग नीचे से उपर की तरफ़ थी सो वे भाग कर छत पर पहुँचे। लोगों ने उन्हे सुझाव दिया कि हम नीचे चादर पकड़ते है और तुम एक एक कर उपर से कूद जाओ, सबसे पहले नशे में टुन्न शराबी कूदा नीचे से लोगों ने चादर हटा ली और शराबी जिस गति से नीचे आये उसी गति से हमेशा के लिये उपर ...
अब लोगो ने उन्हें कूदने को कहा और समझाया कि शराबी रोज रात को नशे में लोगो को परेशान करता था इसलिये उसे मारना जरूरी हो गया था
बेचारा मारवाड़ी उनकी बातों में आ गया और कूदा.... उसका भी वही हाल हुआ..
अब लोगो ने बंता को समझाया कि यह आदमी मिलावट करता था इसलिये....
पर बंता नहीं माने आग की लपटॆं बढ़ती जा रही थी, आखिर बंता ने खुद ही इलाज ढूंढ लिया और बोले मुझे आप पर भरोसा नहीं है कहीं फ़िर से चादर हटा लोगे, इससे तो अच्छा है कि आप चादर को जमीन पर बिछा दो और सारे लोग बीस फ़ूट दूर खड़े हो जाओ...
चार कन्धो मे लिये जा रहे थे
आठ आसूँ भी बहा रहे थे
चैन की नींद मिली नही जीते जी
अब चन्दन के सेज सजे जा रहे थे

था मै कितना बुरा अब तक
लोग अच्छा कहे जा रहे थे
खूद के लिये कभी जपे नही
मेरे लिये रामनाम लिये जा रहे थे

ना कोई भेद था, ना कोई फरेब थे
कल जो थे दूर, आज कितने करीब थे
कल थे अलग, आज सब एक थे
कोई काला ना पीला, सब सफेद थे

किस किस ने दी कुर्बानी समय की
किस किस ने तकलीफ सहे थे
आज उसने भी मीटिंग cancel की
जो कल online हो कर भी away थे

मौत का देखो यहां
कितना सुन्दर नजारा था
जो कल हुआ ना अपना,
वो आज हमारा था

मन करता कि मै उठ जाऊ
सब को एक बार गले लगाऊ
पर इन्तजाम काफी अच्छा था
गिरू ना, रस्सी से बान्ध रखा था

अब तक जी कर मर रहा था
अब मर कर जी रहा था
कल अपनी साँसो से बोझिल
आज सबकी धडकनो मे धडक रहा था

पर लोग जब मरे हुये को इतना प्यार करते है
क्यो नही जीते जी उनके गले लगते है
मरने के बाद उनके घर मोह्ल्ले भर का खाना
जीते जी क्यो उनके घर चुल्हे नही जलते है
 
"राहों की साज़िशों पे.. ज़रा ध्यान दीजिए,
हर मोड़ पे मकाम की, पहचान कीजिए.'

'पीछे पलट के ऱोंकिए, दुश्मन के वार को,
बुज़दिल को एक बार फिर.. हैरान कीजिए.'

'अपने ही दिल से कीजिए.. कुछ आज गुफ़्तगू ,
इस बेदिली को दिल से अब.. अन्जान कीजिए.'

'मज़हब के नाम पे, ना अब हो ख़ून-ख़राबा,
अपने लहू को मुल्क पे.. कुर्बान कीजिए.'

'दो-चार फैसलों से, ना कुछ काम चलेगा !!!
हर फ़ैसले के साथ कुछ .. ईमान कीजिए.'

'जड़ से उखाड़ फेंकिये.. नफरत के शज़र को,
रोशन दिलों में प्यार का.. फर्मान कीजिए.'

'रिश्तों को हर क़दम पे.. निभाओ मगर हुज़ूर !!!
बेवजह ना अपना कभी.. नुक़सान कीजिए.'

'है ज़िन्दगी तो मुश्किलें भी, साथ साथ हैं,
मुश्किल को नाप-तौल के.. आसान कीजिए.'

'मिट्टी के नशेमन हैं, ना इनको उज़ाड़िए,
इतना तो ग़रीबों पे अब.. अहसान कीजिए.'

'मेरी है गुज़ारिश, तो अभी आप भी हमदम,
अंदाज़ में अपने ही कुछ .. बयान कीजिए...!!!"
 
अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करना
ये उसका शौक है यारों सभी से दिल्लगी करना

सभी जज़्बात को दीवानगी की हद समझते हैं
ये ऐसा दौर है इसमें संभल कर शायरी करना

अंधेरे आँधियाँ बनकर चिरागों को बुझाते हैं
बड़ा मुश्किल है दुनिया में ज़रा सी रौशनी करना

खिजाएँ ढूँढती फिरती हैं बाग़ों में बहारों को
न लब पर फूल महकाना, न आँखें शबनमी करना
 
ज़िंदगी बस मौत का इंतज़ार है, और कुछ नहीं।
हर शख़्स हुस्न का बीमार है, और कुछ नहीं।।

तुमको सोचते-सोचते रात बूढ़ी हो गई,
आँखों को सुबह का इंतज़ार है, और कुछ नहीं।।

अब तो जंगलों में भी सुकूँ नहीं मिलता,
हर चीज़ पैसों में गिरफ़्तार है, और कुछ नहीं।।

यह न सोचो, कहाँ से आती हैं दिल्ली में इतनी कारें,
जिनकी हैं, उनकी एक दिन की पगार है, और कुछ नहीं।।

नेताओं की दुवा-सलामी से कभी खुश मत होना,
चुनाव-पूर्व के ये व्यवहार हैं, और कुछ नहीं।।

हमने अपनी जी ली, जितना खुद के हिस्से में था,
बाकी की साँसें दोस्तों की उधार हैं, और कुछ नहीं।।

तेरे न फ़ोन करने पर, जब भी हम शिकायत करें,
इसे गिला मत समझना, ये तो प्यार है, और कुछ नहीं।।
अब हम से और अपने दिल को बहलाया नहीं जाता
जिन्हें पाने की हसरत है उन्हीं से गैर कहलाया नहीं जाता

बहुत सोचा नहीं रक्खूँगा पाँव राह-ए-उल्फत में
मगर वो रुप आँखों से पलभर भी टहलाया नहीं जाता

नहीं रोकूँगा अब दिल को कदमबोसी से दिलबर की
ज़ख्मी जिगर ये आँसुओं से और नहलाया नहीं जाता

बयाँ कर दूँगा अपना हाल-ए-दिल महबूब के आगे
देखूँगा कि क्या छालों को फिर भी सहलाया नहीं जाता

दिल पे जो गुजरी उसे जब जान वो लेगी
यकीं है मुझसे बोलेगी था पहले बतलाया नहीं जाता
 
कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं
मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं

कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में
सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं

कई सदियों में आती है कोई सूरत हसीं इतनी
हुस्न पर हर रोज कहां ऐसे श़बाब आते हैं

रौशनी के वास्ते तो उनका नूर ही काफी है
उनके दीदार को आफ़ताब और माहताब आते हैं
 
"दुनिया को शिकायत कि मैं ठहरा ना अभी तक ??
आवारगी तो यार!! मेरी आदतों में शामिल !!!'

'हम बेअदब हैं, हम पे ये इल्ज़ाम.. बेवजह है,
गिरतों को थामना तो मेरी फ़ितरतों में शामिल !!!'

'इस बार परिंदों का है.. कयाम मेरे दर पर,
गुलशन वो ख़ुश्बुओं का.. मेरी मेहनतों में शामिल !!!'

'फिर से मैं चल दिया हूँ, नयी मंज़िलों की जानिब,
ख़ुशियों का कारवाँ तो मेरी रुख़सतों में शामिल !!!'

'है ख़ुशफ़हम ये दिल.. कि सभी दोस्त हमसफ़र हैं,
रिश्तों की मिल्कियत तो मेरी गफलतों में शामिल !!!'

'अब क्या कहें कि किस तरह.. उनसे नज़र मिली थी??
दीवानगी तो यार!! मेरी हरकतों में शामिल !!!'

'क्या फ़र्क़ कि कुछ और दर्द.. मैं उधार ले लूँ ??
गैरों के ग़म सदा ही.. मेरी चाहतों में शामिल !!!'

'कितने ही तमाशे दिखे हैं.. जुल्मतों के लेकिन,
केवल खुदा का डर ही, मेरी दहशतों में शामिल !!!'

'बेरंग मौसमों में दख़ल..यार!! कुछ रखा है,
वो रंग फ़िज़ाओं का.. मेरी बरकतों में शामिल !!!'

'माना कि ये बदनाम दौर.. रंज़िशों का है पर,
उम्मीद के अशआर.. मेरी सोहबतों में शामिल...!!"
 
चांद तन्‍हा है आसमां तन्‍हा
दिल मिला है कहां कहां तन्‍हा

बुझ गयी आस छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्‍हा

जिंदगी क्‍या इसी को कहते हैं
जिस्‍म तन्‍हा है और हां तन्‍हां

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे तन्‍हा तन्‍हा

जलती बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्‍हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये जहां तन्‍हा
 
"गिरती हुई दीवार पे, अब लोग हँसते हैं,
ऐसे ही हादसों में जबकि.. ख़ुद भी फँसते हैं.'

'धरती की प्यास किस तरह से.. अबके बुझेगी??
बादल भी देखिए तो.. ठहर के बरसते हैं.'

'मंदिर में चढ़ावे की.. सबको फ़िक्र बराबर,
क्या फ़र्क कि बाहर ग़रीब, क्यों तरसते हैं?? '

'अपने गमों को आप.. अब ख़ुद में समेट लो,
सुनते हैं लोग और ग़म पे, फिकरे कसते हैं.'

'उस छोर पे सुरंग के.. एक रोशनी सी है,
उम्मीद रखो तो अभी.. हज़ार रस्ते हैं.'

'वो जो पराए अश्क़, ख़ुशी से सँभाल लें !!!
मेरी नज़र में लोग वो.. सचमुच फ़रिश्ते हैं.'

'बेवजह तमाशे दिखा के.. वो हुए रुख़सत,
वो जिस जगह के हैं.. वहाँ पत्थर बरसते हैं.'

'अंज़ाम अनसुनी सी.. दुआओं का फ़कत ये,
गुलशन में फूल ख़ुश्बुओं के, अब झुलसते हैं.'

'वो अपनी पीठ ख़ुद ही.. थपथपा रहे यारब !!!
जिनके उसूल आज.. शराबों से सस्ते हैं...!!!"
एक ग्रामीण पिता-पुत्र अपने नजदीकी शहर में शॉपिंग मॉल देखने गये। यूं तो वहां की हर चीज देखकर वे चकित थे परन्तु एक जगह एक खुलने और बन्द होने वाली दीवाल (लिफ्ट) देखकर वे विशेष रूप से प्रभावित हुये। उन्होंने ऐसी दीवाल पहले कभी नहीं देखी थी ।
जिस समय वे पिता पुत्र आंखे फाड़ फाड़ कर उस दीवाल को देख रहे थे उसी समय एक बूढ़ी औरत उस दीवाल के पास पहुंची और दीवाल पर लगा एक बटन दबाया। बटन दबाते ही दीवाल खुल गई और बूढ़ी औरत उस दीवाल के अन्दर चली गई । दीवाल फिर बन्द हो गई। थोड़ी देर बाद दीवाल अपने आप खुली और उसमें एक पच्चीस साल की खूबसूरत लड़की बाहर निकली।
पिता यह सब देखकर लगभग चिल्लाते हुये पुत्र से बोला - ''बेटा, जल्दी घर जा और अपनी मां को लेकर आ।''
 
नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना,
अगर काम पड़े तो याद करना,
मुझे तो आदत है आपको याद करने की,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......

ये दुनिया वाले भी बड़े अजीब होते है
कभी दूर तो कभी क़रीब होते है
दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है
और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है .......


एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर,
हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर,
मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना,
हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर.........


ख़ामोशियों की वो धीमी सी आवाज़ है ,
तन्हाइयों मे वो एक गहरा राज़ है ,
मिलते नही है सबको ऐसे दोस्त ,
आप जो मिले हो हमे ख़ुद पे नाज़ है ..........
 
कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
तो वो बोले

खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल
बहूत खूबसूरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !
कभी मैं जो कह दूं मोहब्बत है तुम से !
तो मुझको खुदारा गलत मत समझना !
के मेरी जरुरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !

है फ़ुलों की डाली, ये बाहें तुम्हारी !
है खामोश जादू निगाहें तुम्हारी !
जो काटें हों सब अपने दामन में भर लूं !
सजाउं मैं इनसे राहें तुम्हारी !
नज़र से जमाने की खुद को बचाना !
किसी और से देखो दिल न लगाना !
के मेरी अमानत हो तुम !
बहुत खूबसूरत हो तुम !

है चेहरा तुम्हारा के दिन है सुनेहरा !
और उस पर ये काली घटाओं का पेहरा !
गुलाबों से नाजु़क मेहकता बदन है !
ये लब है तुम्हारा के खिलता चमन है !
बिखेरो जो जु़ल्फ़ें तो शरमाये बादल !
ये ताहिर भी देखे तो हो जाये पागल !
वो पाकीजा़ मुरत हो तुम !
बहुत खूबसूरत हो तुम !

मोहब्बत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !
जो बन के कली मुस्कूराती है अक्सर !
शबे हिज्र मैं जो रुलाती है अक्सर !
जो लम्हों ही लम्हों मे दुनिया बदल दे !
जो शायर को दे जाये पेहलु ग़ज़ल की !
छुपाना जो चाहे छुपाई न जाये !
भुलाना जो चाहे भुलाई न जाये !
वो पेहली मोहब्बत हो तुम !
बहुत खूबसूरत हो तुम !! ................................
 
"है तुमको ये वहम कि हम उनके अज़ीज़ हैं,
महफ़िल में उनकी अब हमें.. बे-जाम देखना.'

'मिलकर बड़ों ने घर को.. कब का बाँट दिया है!!!
बच्चों का साहिलों पे.. ज़रा काम देखना.'

'सच बोलने की फिर से ये, बख़्शीश मुक़र्रर,
एक और ज़ख़्म फिर मेरे.. सरनाम देखना.'

'दुनिया के हर सवाल पे, ख़ामोश रहेंगे,
बेग़ैरती का हम पे फिर.. इल्ज़ाम देखना.'

'मज़हब के नाम पे.. लड़े हैं फिर वतन के लोग,
रुसवाई अब वतन की.. सरे-आम देखना.'

'बस्ती ये ग़रीबों की.. बहुत जल्द जलेगी,
शोहरत की आँधियों का.. इंतक़ाम देखना.'

'तारीफ़ इमारत की तो.. हर बार हुई है,
अब नींव के पत्थर को भी.. गुमनाम देखना.'

'मैने कहा था यार !!! मगर तुम नहीं माने,
अब उनसे दिल लगाने का.. अंज़ाम देखना.'
 
मैं हुँ एक हिरन का बच्चा
और यह मेरी कहानी है.
एक पल में मिले ज़िन्दगी,,
तो दूजे में मौत भी आनी है

ज़मीं पर मेरा, वोह पेहला क़दम
फिर दौड्ते हुए वो माँ के पास जाना.
लड़खड़ाते क़दम को आगे बढ़ा के
जा के माँ के आँचल में मेरा छीप जाना..

हरी हरी घास और वह हरी पत्तियाँ..
नयी उमंगे जगाएँ उड़ती हुई तितलियाँ...
हर और देखूँ मैं ईस अजनबी दुनिया को
अपनी सी लगे मेरी माँ की प्यारी सी अखियाँ..

खेलूँ, कुदु, दौडू, भागू,
हर पल मैं अपनी माँ को सताउ
फिर यहाँ वहाँ भाग दौड के
जा के अपनी माँ के पास बैठ जाउ..

ईस ख़ुशी भरे लम्हों में,
एक दिन गम का माहॉल छा गया..
जब शेर मुझे उसके मुह मे लेके
अपना शिकार बना कर चला गया

भागने की कोशिश की थी बहोत..
पर मैं शेर के पंजे से बच ना सका
ज़िन्दगी के उस आख़िरी पल में
अपनी माँ को भी मैं देख ना सका

कुछ पल के लिये ही सही मुझे
ईस अजनबी दुनिया ने अपना बनाया था
मेहसुस कर रहा था माँ की रोती हुई उन आँखो को
जब शेर ने मुझे अपना निवाला बनाया था

मैं हुँ एक हिरन का बच्चा
बस यह मेरी कहानी है.

बस यह मेरी कहानी है. .......!
 
बातें करके रुला ना दीजिएगा...
यू चुप रहके सज़ा ना दीजिएगा...

ना दे सके ख़ुशी, तो ग़म ही सही...
पर दोस्त बना के यूही भुला ना दीजिएगा...

खुदा ने दोस्त को दोस्त से मिलाया...
दोस्तो के लिए दोस्ती का रिस्ता बनाया...

पर कहते है दोस्ती रहेगी उसकी क़ायम...
जिसने दोस्ती को दिल से निभाया...

अब और मंज़िल पाने की हसरत नही...
किसी की याद मे मर जाने की फ़ितरत नही...

आप जैसे दोस्त जबसे मिले...
किसी और को दोस्त बनाने की ज़रूरत नही....!!!!!!
 
अब क्यूँ आँसुओं की सौगात होगी,
नए लोग हैं सब नयी बात होगी !
बगीचे में नए फूल खिलने लगे हैं,
वहीँ अपनी अब तो मुलाक़ात होगी !
मैं तनहा था लेकिन अब न रहूँगा,
तेरी याद भी तो मेरे साथ होगी !
दिलों के चिराग अब तो बुझने न पायें,
बहुत दूर तक रात ही रात होगी !!!
"हवेलियों में शाम.. बहुत रंगीन मिलती है,
और ग़रीबों के घर में.. बड़ी ग़मगीन मिलती है.'

'बाग़ में जाओ अकेले.. गुलों में बैठो अब,
भीड़ जितनी भी है, तमाशबीन मिलती है.'

'बिक रहा आज भी शहर में, नया कुछ तो नहीं,
गोलियाँ, तेग, कफ़न.. सरज़मीन मिलती है.'

'कारखाने में ढूँढते हो.. क्यों इन्साऩों को??
यहाँ पे बेदिली या फिर मशीन मिलती है.'

'पी के देखो तो आब.. आप इस नदी का कुछ ,
ताज़गी हर लम्हा.. ताज़ातरीन मिलती है.'

'रात को ख्वाब में, मैंने खुदा को देखा था,
वरना कब बंदगी.. इतनी हसीन मिलती है !!!'

'सिर पे कितने ही.. आसमां उठा के आप फ़िरो,
सबको पैरों तले.. हर पल ज़मीन मिलती है.'

'बात करने की ना फ़ुर्सत.. किसी को दुनिया में,
ज़िन्दगी जैसे कोई.. महज़बीन मिलती है.'

'लाओ तशरीफ कभी.. मेरे घर भी तुम यारब !!!
ग़ज़ल हमारे यहाँ.. बेहतरीन मिलती है....!!! "
 
युँ तो बहुत कुछ है पास मेरे फिर भी कुछ कमी सी है
घिंरा हूँ चारो तरफ़ मुस्कुराते चेहरो से
फिर भी जिन्दगी में उजाले भरने वाली उस मुस्कुराहट की कमी सी है
दिख रही है पहचान अपनी ओर उठते हर नज़र में....
फिर भी दिल को छु लेने वालि उस निगाह की कमी सी है
गुँज़ता है हर दिन नये किस्सो, कोलाहल और ठहाको से
फिर भी कानो में गुनगुनाति उस खामोशी कि कमी सी है
बढ़ रहे है कदम मेरे पाने को नयी मन्ज़िलें
फिर भी इन हाथो से छुट चुके उन नरम हाथो की कमी सी है
ऐसी तलाश पे निकल चला हूँ मैं
ना शुरुआत का , न अंत का पता
ऐसा खोया हूँ मैं इसमें यारों
ना सुबह का , ना शाम का पता

हमदर्दी कर सकते हैं वो,
खुद का दर्द जिनका हो कम,
बेदर्द ना समझना हमको तुम,
अपने भी है यारो लाखों गम.

अपनी तो हर शाम एक नशे में
गुज़र जाती है, इक दिन शाम नशे में
होंगी और हम गुजर जायेंगे.
 
aक अंधी लडकी थी । उसे उसके एक दोस्त के अलावा सबने ठुकरा दिया था । पर वो दोस्त उससे बहुत प्यार करता था । लडकी रोज़ उससे ये कहती कि अगर वो उसे देख पाती तो उसी से शादी करती । एक दिन किसी ने उस लडकी को अपने आंखे दे दीं । जब वो देख सकने लगी तो उसने देखा की उसका वह दोस्त अंधा था । दोस्त ने उससे पूछा की क्या अब वो उससे शादी करेगी ? लडकी ने साफ़ इनकार कर दिया । इस पर उसका दोस्त मुस्कुराया और चुप चाप उसे एक कागज़ देकर चला गया । उसपर लिखा था -


"मेरी आखों का ख्याल रखना
कोई तुम से पूछे कौन हू मै,
तुम कह देना, कोई खास नही.

इक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
इक झूठ है आधा सच्चा सा.

जज़्बात को ढांपे इक पर्दा. बस इक बहाना अच्छा सा.
जीवन का ऐसा साथ है. जो दूर ना होकर पास नही.

कोई तुम से पूछे कौन हूं मै, तुम कह देना कोई खास नही
बहुत दिन हुए वो तूफ़ान नही आया,

उस हसीं दोस्त का कोई पैगाम नही आया,

सोचा में ही कलाम लिख देता हूँ,

उसे अपना हाल- ए- दिल तमाम लिख देता हूँ,

ज़माना हुआ मुस्कुराए हुए,

आपका हाल सुने... अपना हाल सुनाए हुए,

आज आपकी याद आई तो सोचा आवाज़ दे दूं,

अपने दोस्त की सलामती की कुछ ख़बर तो ले लूं
 
मेरी मोहब्बत के फसानो में कभी कमी तो ना आई थी,
तेरे अफ्सानो के चर्चो में कभी कमी तो ना आई थी,
की अब तो खुदा भी कभी-कभी हमारी दुआओं का असर देता है,
यों तो खुदा के दर पे भी कभी दीवानों की कमी तो आई ना थी,
लाख मना ले दुनिया इस रूठे सनम को, सारी कसरत कर ले,
मोहब्बत का जनाज़ा उठाने में कंधो की कमी कभी आई ना थी.......
वो एक दीया,
जिसने ललकारा है, अँधेरे को
वो एक दीया,
जिसने हिम्मत की है, तेज़ आँधियों से लड़ने की
वो एक दीया,
जो खुद जला है, औरों की रोशनी के लिए
वो एक दीया,
जो प्रेरणा-स्त्रोत है , हर मद्धिम पड़े दीये के लिए
वो एक दीया,
जिसे ख्याल है, अपनी मर्यादा का
वो एक दीया,
जिसे विश्वास है, अपनी काबिलियत पर
वो एक दीया,
जिसे गर्व है , अपनी संस्कृति पर
वो एक दीया,
जो कहीं-ना-कहीं बसा है, हर किसी के हृदय में

क्यों ना उन दीयों को साथ यूँ सजाएँ हम ,
ना अँधेरा रहे कहीं दूर-दूर तक
कुछ इस तरह से दीवाली मनाएँ हम ।

आप को दीवाली की बहुत-बहुत शुभकामना
 
शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?

जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है ?



पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?

सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?



अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?

108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?



इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,

लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.



मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,

लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?



कब डूबते हुए सुरज को देखा त , याद है?

कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?



तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है

जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या है?
जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है ,

हर लडकी का है Boy Friend, हर लडके ने Girl Friend पायी है ,

चंद दिनो के है ये रिश्ते , फिर वही रुसवायी है .



घर जाना Home Sickness कहलाता है ,

पर Girl Friend से मिलने को टाईम रोज मिल जाता है .

दो दिन से नही पुछा मां की तबीयत का हाल ,

Girl Friend से पल - पल की खबर पायी है,

जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है …..



कभी खुली हवा मे घुमते थे ,

अब AC की आदत लगायी है .

धुप हमसे सहन नही होती ,

हर कोई देता यही दुहाई है .



मेहनत के काम हम करते नही ,

इसीलिये Gym जाने की नौबत आयी है .

McDonalds, PizaaHut जाने लगे,

दाल- रोटी तो मुश्कील से खायी है .

जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है …..



Work Relation हमने बडाये ,

पर दोस्तो की संख्या घटायी है .

Professional ने की है तरक्की ,

Social ने मुंह की खायी है.

जिन्दगी ये किस मोड पे ले आयी है ….
 
आज भी मेरा मन जाने क्यों जीने को नही करता है ,
फिर भी तेरी बातें सोचकर ये चेहरा हँसा करता है,
आज भी ये दिल जाने क्यों सपनो में खोया रहता है,
छुप छुप के किसी कोने में ये आज भी रोया करता है,
मेरा ही अक्स जाने क्यों अक्सर मुझसे ये सवाल करता है,
आज भी क्यों वो मुझमें तेरा ही चेहरा देखा करता है,
जाने अन्जाने में ये दिल बस तेरी ही बातें करता है,
जाने क्यों कुछ सोचकर फिर शरमा जाया करता है ,
आगे बढ़ते हाथ जाने क्यों रूक जाया करते है,
शायद कुछ अनहोनी सोंचकर कुछ भी छूने से डरते है,
एक ख़याल मेरे जेहन में आज भी उठा करता है,
तू ही मेरा वजूद है और ये दिल तुझसे ही डरता रहता है,
जाने क्यों ऐसा होता है,
क्या रात के बिना सवेरा भी कही हुआ करता है........
 
हर नज़र को एक नज़र की तलाश है,

हर चहरे मे कुछ तोह एह्साह है,

आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,

क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,

तोह चाँद की चाहत किसे होती.

कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,

तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.

कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,

इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,

जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,

न बताकर बेवफाई मत करना.

दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है

अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है

दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,

अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.

दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.

दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,

इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,

यह वो "अनमोल" मोटी है जो बिकता नही . . .

सची है दोस्ती आजमा के देखो..

करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,

बदलता नही कभी सोना अपना रंग ,

चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो
इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.

जो ना समझ सके, उनके लिये "कौन".
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.

दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.

सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.

आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ.
मैं तन्हाई का राही कोई अपना ना बेगाना
मुझको हंसी थी मिली साये लिए दुःख के
खुल के रो भी ना सका किसी के कंधे पे झुक के
मेरा जीवन भी क्या है अधूरा सा अफसाना
था प्यार का एक दिया वो भी बुझा डाला
खुशी भी दोस्तो से है,
गम भी दोस्तो से है,

तकरार भी दोस्तो से है,
प्यार भी दोस्तो से है,

रुठना भी दोस्तो से है,
मनाना भी दोस्तो से है,

बात भी दोस्तो से है,
मिसाल भी दोस्तो से है,

नशा भी दोस्तो से है,
शाम भी दोस्तो से है,

जिन्दगी की शुरुआत भी दोस्तो से है,
जिन्दगी मे मुलाकात भी दोस्तो से है,

मौहब्बत भी दोस्तो से है,
इनायत भी दोस्तो से है,

काम भी दोस्तो से है,
नाम भी दोस्तो से है,

ख्याल भी दोस्तो से है,
अरमान भी दोस्तो से है,

ख्वाब भी दोस्तो से है,
माहौल भी दोस्तो से है,

यादे भी दोस्तो से है,
मुलाकाते भी दोस्तो से है,

सपने भी दोस्तो से है,
अपने भी दोस्तो से है,

या यूं कहो यारो,
अपनी तो दुनिया ही दोस्तो से
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी तो,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥
एक दिन राजू के पापा एक रोबोट ले कर आये.

वह रोबोट झूठ पकड़ सकता था और झूठ बोलने वाले को गाल पर खीँच कर चांटा मार देता था.

आज राजू स्कूल से घर देर से आया था... पापा ने पूछा "घर लौटने में देर क्यो हो गयी?"

"आज हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस थी" राजू ने जवाब दिया...

रोबोट अचानक अपनी जगह से उछला और जमकर राजू के गाल पर चांटा मार दिया.

पापा हंसकर बोले, "ये रोबोट हर झूठ को पकड़ सकता है और झूठ बोलने वाले को चांटा भी मारता है. अब सच क्या है यह बताओ... कहाँ गए थे?"

"में फिल्म देखने गया था" राजू बोला

"कौन सी फिल्म?" पापा ने कड़ककर पूछा

"हनुमान"
चटाक... अभी राजू की बात पूरी भी नहीं हुई थी की उसके गाल पर रोबोट ने एक जोर का चांटा मारा.

"कौन सी फिल्म?" पापा ने फिर पूछा

"कातिल जवानी."

पापा ग़ुस्से में बोले "शर्म आनी चाहिए तुम्हे. जब में तुम्हारे जितना था तब ऐसी हरकत नहीं किया करता था."

चटाक... रोबोट ने एक चांटा मारा... इस बार पापा के गाल पर.

यह सुनते ही मम्मी किचन में से आते हुए बोली "आख़िर तुम्हारा बेटा है ना... झूठ तो बोलेगा ही"

अब मम्मी की बारी थी... चटाक...
दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ -अदाई मधुशाला....

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला...

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला...

याद न आए दूखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला...
जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला...

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला....
 
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