11/1/07

यारों तुम्हारे नाम...!!!

"खुदा जाने !! हमें वो किस तरह.. नीलाम करते हैं??
हमारी 'शायरी ' को बेवजह.. बदनाम करते हैं.'

'भले ही दिन गुज़र जाए , फ़कत ख़ामोश लमहों में,
हंसी के चंद कतरों से.. हम सुबह-ओ-शाम करते हैं.'

'है क़ायम सिलसिला.. लेने का - देने का ग़रीबों से,
खुशी देकर उन्हें, ग़म उनका.. हम सरनाम करते हैं.'

'ये मेरी शख़्सियत उनकी.. अदावत से निखर आई,
तहे दिल से रकीबों का.. हम एहतऱाम(सम्माऩ) करते हैं.'

'सज़ा जैसे ना कोई बात.. ये फ़ितरत है मिज़ाज़ों की,
डगर काँटों भरी हो जब भी.. हम क़याम करते हैं.'

'बुज़ु्र्गों से विरासत में.. मिली ये खासियत हमको ,
क़ि हम साज़िश को, हऱ पल हऱ कदम.. ऩाकाम करते हैं.'

'दुआयें और मोहब्बत से भरा.. दिल साथ रखा है,
सफ़र के पहले बस इतना.. हम एहतमाम (तैय्याऱी) करते हैं.'

'लगी जाती है मज़लिस ख़ुद ब खुद.. दर पे दीवाऩों की,
हम अपनी ये गज़ल.. यारों तुम्हारे नाम !! करते हैं.'

'अकल को ज़िन्दगी भर हमसे, ये शिकवा रहा 'शायर',
क़ि हम जोश-ओ-ज़ुनूं से ही.. हमेशा काम करते हैं...!!!"

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